Raw Review Movie Dil Bechara-सबको रुला कर जिंदगी में खुश रहना सीखा गए सुशांत

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Raw Review Movie Dil Bechara-सबको रुला कर जिंदगी में खुश रहना सीखा गए सुशांत

Raw Review Movie Dil Bechara-फिल्म को देखकर भावुक ना होना, शायद किसी के लिए संभव नहीं रहा है। फिल्म में मैनी (सुशांत सिंह राजपूत) होंठो पर मुस्कान और आंखों में जिंदगी लिये कहता है- जन्म कब लेना है और मरना कब है, ये हम डिसाइड नहीं कर सकते। लेकिन कैसे जीना है वो तो हम डिसाइड कर सकते हैं। यह सुनते ही दिमाग में 14 जून की याद सामने आ जाती है, जब इस सितारे ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। बता दूं, भावुकता को परे रखकर समीक्षा कर पाना आसान नहीं है। लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि सुशांत फिल्म की जान हैं।

निर्देशक- मुकेश छाबरा
कलाकार- सुशांत सिंह राजपूत, संजना सांघी, स्वास्तिका मुखर्जी, साश्वता चटर्जी
प्लेटफॉर्म- डिज़्नी+हॉटस्टार

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Raw Review Movie Dil Bechara-सबको रुला कर जिंदगी में खुश रहना सीखा गए सुशांत

फिल्म की कहानी (Movie Story) -कहानी में काफी कम किरदार हैं, जहां हीरो और हीरोइन हैं किज्जी बासु (संजना सांघी) और इम्मानुअल राजकुमार जूनियर उर्फ़ मैनी। दोनों एक दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं और इनकी मुलाकात कॉलेज फेस्ट के दौरान होती है। किज्ज़ी थाइरॉयड कैंसर से पीड़ित है। वह मजबूत है लेकिन खुद में सिमटी रहना पसंद करती है, उसे मालूम है कि उसकी ज़िंदगी औरों से अलग है। वहीं रजनीकांत फैन मैनी एक जिंदादिल और मसखरी पसंद लड़का है। दोनों के बीच लगातार मुलाकातें होती हैं और इस दौरान किज्ज़ी को मालूम पड़ता है कि मैनी कैंसर सरवाइवर रह चुका है। चंद मुलाकातों के बाद ही दोनों में प्यार हो जाता है। लेकिन यह प्यार एक दूसरे के लिए जान देने वाला प्यार नहीं, बल्कि एक दूसरे की मजबूत कड़ी बनकर साथ जिंदगी जीने वाला है। दोनों के कुछ ख्वाब हैं, जिन्हें वो एक दूसरे के लिए पूरा करते हैं। मैनी किज़्जी की ज़िंदगी में प्यार लेकर आता है, उसे खुलकर जिंदगी जीने का सलीका सिखाता है। जो शायद हर इंसान के लिए किसी सबक की तरह है। यह बहुत ही अच्छी फिल्म है और इसका end शायद ही आप Miss करना चाहेंगे।

अभिनय (Acting) -केश छाबरा की इस फिल्म का मजबूत पक्ष इसकी कास्टिंग है। मस्तमौला और जिंदादिल मैनी के किरदार में सुशांत सिंह राजपूत खूब जंचे हैं, वहीं उनके सामने जमकर टिकी हैं संजना सांघी। दोनों की कैमिस्ट्री फिल्म में बखूबी दिखाई गयी है। किज्ज़ी के मां- पिता के किरदार में स्वास्तिका मुखर्जी और शाश्वत चटर्जी अच्छे लगे हैं। दोनों अपने किरदार के प्रति सच्चे दिखे हैं। फिल्म में बंगाली परिवार दिखाया गया है, जिस लिहाज से निर्देशक ने बिल्कुल सटीक कास्टिंग की है। वहीं, मैनी के दोस्त के रोल में साहिल वैद ने न्याय किया है। मुकेश छाबरा ने फिल्म में सुशांत का एक अलग अंदाज लोगों के सामने पेश किया है, जहां वो कॉमेडी, रोमांस, इमोशनल हर तरह की भावनाओं को निभाते दिखे हैं। ना सिर्फ सुशांत की आखिरी फिल्म, बल्कि सुशांत की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी दर्शक हमेशा इस फिल्म को याद रखेंगे।

निर्देशन व तकनीकि पक्ष (Guidance And Technical Aspects) -जॉन ग्रीन की किताब द फॉल्ट इन आवर स्टार्स को भारतीय दर्शकों के पसंद को ध्यान में रखते हुए पटकथा में बदला है शशांक खेतान और सुप्रोतिम सेनगुप्ता ने। हालांकि किताब से फिल्म बनाने की प्रक्रिया में कहानी अपना चार्म खो देती है। कहानी में वो गहराई और भावनात्मक आर्कषण नहीं दिखता है। कमजोर पटकथा के बीच झूलती फिल्म को एआर रहमान का संगीत और बेहतरीन स्टारकास्ट बचाती है। बतौर निर्देशक यह मुकेश छाबरा की पहली फिल्म है। उन्होंने पटकथा के सभी किरदारों को स्क्रीन पर अच्छा मौका दिया है। कमजोर पटकथा के बीच भी उन्होंने किज्जी- मैनी और परिवार के बीच कुछ यादगार लम्हे बुने हैं। सत्यजीत पांडे की सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है। जमशेदपुर और पेरिस की खूबसूरती के बीच लीड किरदारों को बेहतरीन दिखाया गया है।

देंखे या ना देंखे (See Or Not See) -फिल्म ना देखने का शायद सवाल ही नहीं उठता है। जिंदगी में काफी कम क्षण ऐसे आते हैं, जब आप सभी कुछ भूलकर भावनाओं में बह जाना चाहते हैं। दिल बेचारा देखना वैसा ही है। यह सुशांत सिंह राजपूत के लिए एक मेमोरियल की तरह है। मैनी की तरह ज़िंदादिल सुशांत को आप दिल में रखना चाहते हैं। फिल्म की बेहतरीन स्टारकास्ट के लिए दिल बेचारा देखी जानी चाहिए।

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